Wednesday, October 15, 2008

पत्रकारों का शोषण कब हैडलाइन बनेगी

पांच साल से ‍‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌मीडिया में नौकरी कर रहा हूं कई बार ऐसी रिपोट‍ करने मौका मिला जिसमें किसी के खिलाफ अन्याय हुआ तो बडे जोर शोर से लाईव किया, स्टोरी भी फाईल की, कई बार लगा कि वाह, भ्रष्‌टाचार, बुराई के खिलाफ आवाज उ‌ढाने का सश्कत माध्यम है मीडिया। अभी की सबसे ताजा खबर और हैडलाईन खबर है जै‍ट एयरवैज द्रारा करीब एक हजार लोगों की निकालने की खबर । मै भी मानता हूं गल्त हुआ है एक हजार लोगों के साथ, देश दुनिया में जब भी कुछ गल्त हुआ मीडिया के बडे सीनियर पत्रकार बडी-बडी चरचाएं करते है सरकार से प्रशासन से जवाब मांगते है लेकिन आज जो मीडिया में काम करने वाले लोगों का हैरासमैं‍ट होता है उसका समाधान कौन करेगा उनकी खबरे कौन दिखायेगा, विधानसभा चुनाव में ‍टिकट लेने के लिये छोटा नेता बडे नेता से सिफारिश कराता है तो एनडीटीवी हैडलाइन बनाता है लेकिन जब एनडीटीवी या किसी भी अखबार चैनल में नौकरी मांगने जाओ तो बिना सिफारिश के गेट अंदर भी नही घुस पाते, एक पत्रकार आज के समय में १४ से १८ घंटे काम करता है उसके बावजूद भी कोई खबर छूट जाये तो सुबह अपने सीनियर की गाली सुनने को तैयार रहों सैलरी के मामले में तो कुछ चैनलों अखबारों की पुछिये ही मत । कितना हास्यासपद लगता है जब एक रिपोटर दूसरे के अन्याय को खबर बनाता है लेकिन अपने साथ हो रहे अन्याय को नौकरी जाने के डर से अपने मन में ही समेटे रहता है । क्या आज मीडिया में मेहनत, इमानदारी की जगह चापलूसी ने नही ले ली है इस छेत्र में आगे बढने का क्राइ‍टेरिया क्या अब मेहनत रह गया है । मैने अपने कुछ पत्रकार साथियों को देखा है नौकरी से निकलते हुए, , सुबह से शाम तक बिना खाये पिए काम करने के बावजूद गालियां खाते हुए । ये लेख लिखने से मेरा मतलब है सिफॆ इतना है कि एक पत्रकार के खिलाफ उसी के सीनियर द्ववारा होने वाले अन्याय को आखिर कोन उठायेगा कौन दिखायेगा, कौन चरचाएं करेगा

1 comment:

Manjit Thakur said...

बहुत बढिया, जेट एयरवेज़ ध्यान में है? ओकळ में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना?